उत्तराखंड की प्रसिद्ध लोकगायिका कबूतरी देवी का निधन

नैनीताल  ( nainilive.com)- उत्तराखंड की प्रथम एवं प्रसिद्ध लोकगायिका कबूतरी देवी का निधन हो गया है. कबूतरी देवी के निधन से लोकगायकी के क्षेत्र में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है और राज्य ने अपनी एक विलक्षण प्रतिभा खो दी है। बीते दिनों युवा लेखक अनिल कार्की ने अपनी फेसबुक वाल पर उनके चिकित्सालय में एडमिट होने की खबर डाली थी जिसमे उन्होंने बताया था की उन्हें सांस लेने और दिल में समस्या के चलते अस्पताल में भर्ती कराया गया है । अस्पताल में डॉक्टरों की देखरेख में उनका इलाज चल रहा था। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित लोकगायिका कबूतरी देवी के अस्पताल में भर्ती होने की जानकारी मिलने के बाद लोक संस्कृति पर कार्य कर रहे कई लोगों ने अस्पताल पहुंचकर उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना की थी। कबूतरी देवी मूल रुप से पिथौरागढ़ के मूनाकोट ब्लाक के क्वीतड़ गांव की निवासी हैं।

उनके गाँव की स्थिति भौगोलिक रूप से अति दुर्गम है, आज भी कबूतरी देवी के गांव तक पहुंचने के लिए 6 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। 70 के दशक में जिस वक्त उत्तराखंड की कोई भी महिला संस्कृतिकर्मी आकाशवाणी के लिये नहीं गाती थीं। उस वक्त कबूतरी देवी जी ने पहली बार पहाड़ के गांव से स्टूडियो पहुंचकर रेडियो जगत में अपने गीतों से धूम मचा दी थी। पहाड़ के जनमानस के गीतों द्वारा कबूतरी देवी ने उत्तराखंड को देश विदेश में एक अलग पहचान दिलाई . आकाशवाणी के लिये कबूतरी देवी जी ने करीब 100 से ज्यादा गीत गाये थे। 1970-80 के दशक में उनके के गीत आकाशवाणी के रामपुर, लखनऊ, नजीबाबाद और चर्चगेट, मुंबई के केन्द्रों से प्रसारित हुए थे. उनका गाया “पहाड़ों को ठण्डो पाणि, कि भलि मीठी बाणी” गीत आज भी हर किसी की जुबां पर आता है। कबूतरी देवी को उत्तराखण्ड की तीजन बाई के नाम से भी जाना जाता था . उनके निधन को प्रदेश के रंगकर्मियों , लोक रंगकर्मियों , साहित्यकारों और शुभचिंतकों ने दुखद और लोकगायकी के क्षेत्र में अप्पोरनिया क्षति बताया.

सोशल मीडिया पर आये शोक संदेशों में युवा कवि एवं लेखक अनिल कार्की ने कुछ इस तरह कबूतरी देवी को दी अंतिम विदाई – लोक गायिका कबूतरी देवी को अंतिम विदा। इस तरह कालीपार नेपाल और काली वार भारत के कामगार मजूरो महिलाओं और पहाड़ी जिजीविषा का बिकट और संयुक्त साझा स्वर अनन्त में विलीन हो गया।
उन्हें सलाम।
आज पनि जौं जौं भोली पनि जौं
परसी त नै जौंला

आज भी जा सकते कल भी जा सकते है
पर परसों तो जाना ही जाना है।
यही सच है इजाओं से इजाओं तक पसरी इस आवाज को सलाम।

मशहूर रंगकर्मी और युगमंच संस्था नैनीताल के ज़हूर आलम ने कहाकबूतरी दीदी का जाना बहुत ही दुखद,और एक सांस्कृतिक युग का अवसान है।कंठकोकिला के रस भरे ऊँचे स्वर हमेशा हमेशा फ़िज़ाओं में गूंजते रहेंगे।ये और भी दुखद हे कि उन पर बन रही फ़िल्म देखने से पहले ही वे इस दुन्याए फानी से रखसत हो गयीं ।उनकी मधुर स्मृतयों को विनम्र श्रधांजलि। ज़हूर।

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