जनता कहिंन…इतिहास दोहराता परिदृश्य…

-संजय नागपाल नैनीताल…

वर्तमान राजनीतिक परिपेक्ष में जो परिस्थितियां कर्नाटक में चुनावों के परिणाम स्वरूप उत्पन्न हुई हैं उन्हें निश्चित ही देश व राज्यों के लिए अच्छा नही कहा जा सकता..पर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकतंत्र में मिलजुल कर सरकारें बनाना गैर वाज़िब नही माना जाता..परंतु राजनीति में शुचिता की कमी आना कोई नई बात नही है..दअसल राजनीति में दबंगई कर नई परंपराएं शुरू करना पुरानी सरकारों के समय शुरू की गई ऐसी रीत है जिसके जाल में अब स्वयं काँग्रेस ही फंस गई है..अब उनके नेता लोकतांत्रिक परंपराओं का हनन बता रहे हैं जिन पर वो स्वयं चला करते थे..
व्यक्तिगत रूप से मुझे बिहार,मणिपुर,गोवा में भाजपा की सरकारें बनने व कर्नाटक में भी उनकी सरकार बनने के कगार पर होने की जुगत से कोई ज्यादा अचरज़ नही हुआ..बस कांग्रेस कार्यकाल में ठीक इसी प्रकार हुए घटनाक्रम याद आने लगे..पर इससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि राजनेताओं पर भी देशवासियों की आस्था प्रबल हो..इसके लिए भी टीम मोदी को कुछ बिल पारित करने चाहिए..
राज्यपालों के पद पर घिस चुके राजनेताओं की नियुक्ति करने का काम कांग्रेस ने ही शुरू किया था..अक्षरशः उसी मार्ग पर चल कर भाजपा ने कांग्रेस को केवल तीन राज्यों तक ही सीमित कर दिया..इस शह और मात के खेल की जनक देश की सबसे पुरानी पार्टी काँग्रेस ही है..
अगर राज्यपालों की नियुक्ति का अधिकार भी संविधान के जानकारों के जिम्मे होता तो निश्चित ही अपने राजनीतिक दलों को आगे बढ़ता हुआ देखने की भूख राज्यपालों को न होती..हालांकि नियुक्ति में अपवाद तो न्यायपालिकाओं में भी देखने को मिलता है पर फिर भी देश की जनता को केवल न्यायपालिकाओं पर ही पूरी आस्था है..जबकि वहाँ भी राजनीतिक दख़ल होता ही रहता है..अर्थात न्यायपालिकाओं में अभी सरकारों का पूर्ण हस्तक्षेप नही है..
इसी तरह से यदि राज्यपालों,राष्ट्रपति और राज्यों व केंद्र में संवैधानिक पदों पर राजनेताओं के स्थान पर संविधान विशेषज्ञों की नियुक्ति की जाय तो स्थितियाँ अलग जरूर हो सकती हैं..पर ऐसा होना नामुमकिन सा प्रतीत होता है..
मुझे याद है..पिछले कार्यकाल में काँग्रेस ने राजनीति में घुसे दागियों के संबंध में बिल लाने के प्रयास में जब संसद में प्रस्ताव पारित किया तो बेशक ही कांग्रेस ने अनमने ही प्रस्ताव पेश किया हो..बीजेपी सहित सम्पूर्ण विपक्ष उस बिल का विरोध करने लगा..अब संविधान में परिवर्तन का जिम्मा तो हमारे इन्ही सांसदों के हवाले है अगर ये अपराधियों को राजनीति से दूर रखना चाहते तो उक्त संबंध में कठोर कानून बना सकते हैं पर राजनीति तो बिना अपराधियों के हो नही सकती इसलिए ये महानुभाव क़ानून क्यों..? बनाने लगे…
कुलमिलाकर भाजपा से देश की जनता को राजनीतिक शुचिता व भ्रष्टाचार,महंगाई से मुक्ति की आशाएं अधिक थी..क्योंकि टीम भाजपा ने कांग्रेस को महा भ्रष्टाचारी घोषित कर पिछले लोकसभा चुनावों में जबरदस्त सफलता प्राप्त की थी..किंतु पूर्व सरकारों के बनाये गए रास्तों पर चलकर कहीं न कहीं भाजपा की छवि भी धूमिल हो रही है..अगर उन्ही पुराने पथों पर बीजेपी आगे भी मार्ग खोजती रहेगी तो निश्चित ही भविष्य की राजनीतिक स्थितयाँ पूर्ववत सुरक्षित रहेंगी..अभी से यह कहना बहुत मुश्किल है…

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