बेलपत्र (एजेल मार्मीलोज) का महत्व:प्रो ललित तिवारी

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संतोष बोरा , नैनीताल ( nainilive.com )- कुमाऊं विश्वविद्यालय वनस्पति विज्ञान के प्रोफेसर ललित तिवारी द्वारा बेलपत्र के महत्व के बारे में बताते हुए कहा है कि भारतीय संस्कृति प्रकृति के विभिन्न अवयवों को एक सूत्र में पिरोते हुए पर्यावरण संरक्षण का संदेा देती है। यहाॅ के विभिन्न मौसम विभिन्न पौधों को समर्पित है तथा उनकी महत्ता मानवीय मूल्यों के साथ धर्म से जुड़ी हुई है। सावन का महीना ओर बेलपत्र की महत्ता सभी को समझ आ जाती है। शिव पार्वती का प्रिय यह पौधा ना केवल हवा को शुद्ध करता है बल्कि ‘र्दानम् बिल्ब पत्रस्य, स्र्पानााम पाप नाानम्‘ जिस्क्स र्दान एवं स्र्पा से पापों का नाा होता है।

स्कंद पुराण के अनुसार बिल्ब माॅ पार्वती के पसीने से बना तथा इस वृक्ष में माता पार्वती के विभिन्न रूप निवास करते है। जड़ में गिरिजा, तने में माहेवरी, शाखाओं में दक्षिणयानी, पत्तियों में पार्वती, फल में कात्यायनी, फूलों में गौरी का रूप माना जाता है तथा शिव को प्रिय है इसलिए पार्थिव पूजा में इसका उपयोग होता है। श्रावण मास में बेलपत्र से ािव को जल चढ़ानें से सभी पाप नट हो जाते है। बेल वृक्ष में मान लक्ष्मी का वास माना जाता है जो समृद्वि एवं सुख तथा स्वास्थ्य की निाानी है।

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वैसे तो बेल का शर्बत बड़ा ही गुणकारी है इसे बिल्ब वृक्ष के साथ-साथ बेलपत्र, पत्ते, गंध के पत्ते, सत्यफल तथा बीली भी कहते है। पत्ते तीन के क्रम में एक साथ तथा नुकीले एवं सुगंधित होते है। यह ऊर्जा क¢ स्तर को बढ़ाता है तथा वायु को शुद्ध करता है। रक्त को साफ करने वाला तथा प्रतिरक्षा क्षमता भी बढ़ाता है।

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वैज्ञानिक भाषा में इसे एजेल मार्मीलोज कहते है तथा इसका कुल रूटेसी है। यह मुख्यतः भारत में तथा दक्षिण एािया, श्रीलंका, थाईलैण्ड में 1200 मी0 की ऊॅचाई तक मिलता है। 30 फीट तक ऊँचे वृक्ष को वुड एप्पल, बंगाल क्ंिवस, गोल्डन एप्पल, स्टोन एप्पल भी कहते है। यह कफ, वात विकार, बदहजमी, दंत रोग, मूत्ररोग, पेचिा, डायबिटीज, पेट दर्द, पीलिया, आॅख रोग, टीबी रोग में लाभप्रद है। इसमें पुप तथा फल का समय फरवरी से जुलाई तक होता है।

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