परंपरा बचेगी तभी बचेगा पहाड़, पानी, पलायन

परंपरा बचेगी तभी बचेगा पहाड़, पानी, पलायन

परंपरा बचेगी तभी बचेगा पहाड़, पानी, पलायन

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न्यूज़ डेस्क , अल्मोड़ा ( nainilive.com )- आर्द्रभूमि और स्प्रिंग जैव विविधता का सबसे अच्छा उदाहरण महावतार बाबा और गर्ग मुनि की तपस्थली से निकलने वाली गगास नदी विकासखंड द्वाराहाट में अल्मोड़ा जिले के द्रोणगिरि, पांडुखोली और भरत कोट के मिश्रित जंगलों के जटिल वेब से उत्पन्न होती है। पश्चिमी रामगंगा (गंगा की एक प्रमुख सहायक नदी) में विलय होने से पहले 125 किलोमीटर की अपनी यात्रा के दौरान, लगभग 70 स्प्रिंग आधारित सहायक नदियों से बनकर भिकियासैण में मिलती हैं, जो 350 गाँवों और तीन हिल स्टेशन में फैले २,00,000 से अधिक लोगों की पीने, सिंचाई और घरेलू जरूरतों को पूरा करती हैं।

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खीरगंगा, माल्या, बैनालीगाड, मनारिगाड, दुशात गाड़ बागर गाड़, रिस्कान, कुंजगाड़ दोनों तटों पर मिलने वाली प्रमुख सहायक नदियाँ हैं, और इसके नदी बेसिन में 500 वर्ग किमी शामिल हैं। उत्तराखंड में मध्य हिमालय के अल्मोड़ा जिलों में द्वाराहाट और ताड़ीखेत विकासखंड आजीविका इन स्प्रिंग बेस्ड नदियों के बिना लगभग असंभव होगी जो पहाड-पानि-परम्परा के साथ स्थानीय लोगों को जीविका बनाए रखती हैं।

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पहाड़ पानी परंपरा के संरक्षण संवर्धन को संकल्पित ग़ैर लाभकारी समुदाय आधारित ग़ैर राजनैतिक संस्था नौला फाउंडेशन के तत्वाधान में हो रहा हैं जिसमे गगास घाटी के ग्राम पंचायत व वन सरपंच प्रतिनिधियो ने जिला पंचायत अध्यक्ष उमा बिष्ट की अध्यक्षता मैं क्षेत्र की जीवनदायिनी गगास नदी पुनर्जीवन का संकल्प लिया । भारत वर्ष में नदियों के जल का ७०% स्प्रिंगफेड परम्परागत प्राकृतिक जल स्रोत है, जो वनाच्छादन की कमी, वर्षा का अनियमित वितरण एवं अनियंत्रित विकास प्रक्रिया के कारण सूखते जा रहे हैं।  

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इस हिमालयी राज्य में गगास स्प्रिंगशेड ( नौले-धारे का रिचार्ज क्षेत्र) संवर्धन पर हो रही इस पंचायत कार्यशाला में असल हितधारक जन समुदाय को बनाया हैं क्योकि सरकार और स्थानीय सामाजिक संस्थाओ के साथ साथ स्थानीय जन भागीदारी को भी आगे आकर हिमालय के सूख रहे पारम्परिक जल स्रोत नौले, धारे, गाड़-गधेरो के साथ वहां की जैव विविधता को भी बचाना होगा और अब ऐसे संतुलित कानून बनाने होंगे। वर्तमान समय में जैव विविधता से समृद्ध हिमालय  की सुंदरता और शांति मानवीय हस्तक्षेप से दांव पर है । ख़तरे की घंटी बज चुकी है, जलवायु परिवर्तन के कारण 50 प्रतिशत से ज्यादा जल धाराएं सूख चुकी है, और जो बची है उनमें भी सीमित जल ही बचा है अगर हम अभी भी नहीं सुधरें तो वो दिन दूर नहीं जब गंगा यमुना जैसी सतत वाहिनी नदिया को बनाने वाली जलधाराएं सूख जाएगी और तब स्थिति कितनी भयावह होगी ये आप कल्पना कर सकते हैं I

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हमारे वेदों  के पारम्परिक जल विज्ञानं पर आधारित परम्परागत जल सरंक्षण पद्धति व सामुदायिक भागीदारी को ज्यादा जागरूक करके पारम्परिक जल सरंक्षण पर ध्यान देना होगा I  अब समय आ चुका हैं हिमालय के लिए एक ठोस नीति बनानी होगी और पर्यटकों पर पर्यावरण शुल्क भी लगाने के साथ साथ प्लास्टिक पर पूर्णतः प्रतिबन्ध लगाना होगा तभी थोड़ा बहुत हम अपने बच्चों को  साफ़ सुधरा भविष्य  दे सकते हैं  I आज पूरा विश्व जिस संकट की आशंका से चिंतित है उसने हमारे दरवाजे पर दस्तक दे दी है I प्रकृति का क्रोध प्रत्यक्ष रूप से हमें विश्व के विभिन्न भागों मै साफ तौर पर दिखाई दे रहा है I  विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक विश्व में साल २०३१ तक सिर्फ ४०% लोगो को ही पीने का जल उपलब्ध हो पायेगा I दूनागिरि – पांडवखोली – भरतकोट के विशाल मिश्रित जंगल की समृद्ध जैव विविधता के संरक्षण संवर्धन को स्थानीय कर्मठ ग्रामीणों व स्वयंसेवी व्यक्तियो व महिला मंगल दलो की परस्पर सामुदायिक सहभागिता से बचाने मैं सफल रहै ।

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इस महिला दिवस के उपलक्ष्य मैं हुई महिला पंचायत कार्यशाला मैं मुख्य अतिथि माननीय जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमति उमा बिष्ट, विशिष्ट अतिथि महिला आजिविक संवर्धन मैं अग्रणी समाजसेवी कमला कैडा व जल जंगल ज़मीन की रक्षा हेतू संकल्पित पर्यावरणविद गजेंद्र पाठक जी, समाजसेवी खेम कठायत, नारायण रावत, महेंद्र बनेशी, आलोक मैनाली, संदीप मनराल, गणेश, ललित कैडा, भुपेंद्र सिह, चंदन रावत । कार्यशाला का आयोजन युवा ग्राम प्रधान सूरना व गगास घाटी के युवाओ की प्रेरणा स्रोत सुमन कुमारी ने नौला फाउंडेशन के तत्वाधान मै किया ।

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