कृषि देव सैटर्न आज व देवो के गुरु बृहस्पति 22 को करेंगे चांद से मिलन

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सौर मंडल के सबसे बड़े चांद ग्यानिमेड व टाइटन होंगे पृथ्वी के चांद के पास

-सौर मंडल के दोनों विशाल ग्रह होंगे हमारे चांद के करीब
-आकाश झाँकने वाली दूरबीन से महान गैलीलियो गैलीलेई ने 1610 मे ही देख लिए थे बृहस्पति के उपग्रह

बबलू चंद्रा , नैनीताल ( nainilive.com )- खगोल विज्ञान मे 1609-10 का विशेष महत्व है क्योंकि इन वर्षों मे महान वैज्ञानिक गैलीलियो ने अपनी दूरबीन से हमारे सौर मंडल के सबसे खूबसूरत ग्रह शनि और सबसे बड़े ग्रह बृहस्पति के चांद देखने के साथ ही कई काल्पनिक बातों का खंडन करते हुए कहा था कि जो कोई दूरबीन से शनि को देख लेगा वो पुराने ख्यालो को बदल लेगा। जबकि हमारे प्राचीन ग्रंथों मे श्लोक है भगं नाक्षत्रमाक्रमय सूर्यपुत्रेण पिड्यते। संवत्सरस्थायिनो च ग्रहोँ प्रजल्लितावुभौ, विशाखयाः समीपस्थॉ बृहस्पति शनैशचरौ ( पूर्वाफाल्गुनी को पकड़कर सूर्यपुत्र शनि पीड़ित करेगा, अत्यंत प्रकाशमान बृहस्पति व शनैशचर ग्रह हमेशा विशाखा नक्षत्र के समीप ही रहेंगे।


शनिवार व रविवार खगोलीय घटनाओं के लिहाज से बेहद खास है, सौर मंडल का विशाल ग्रह बृहस्पति व गले मे ख़ुबसूरत वलयों का हार लिए दूसरा सबसे बड़ा ग्रह शनि चांद के करीब से होकर गुजरेंगे। दोनों इतने विशाल ग्रह है कि देवगुरु मे हमारी पृथ्वी के आकार के 1300 व शनि मे 700 पिंड समा सकते हैं। बहुत प्राचीन काल मे ही विशाल ग्रह को पहचान कर देवगुरु बृहस्पति का नाम दिया गया। तैत्तरीय ब्राह्रण मे उल्लेख है ब्रह्स्पतिः प्रथमः जायमानः, तिष्यनः नक्षत्रमभिसँबभूव (जब बृहस्पति पहले प्रकट हुआ तब वह पुष्य नक्षत्र के समीप था। हमारे देश की पुरानी देवकथाओ के अनुसार बृहस्पति देवताओ के गुरु नाम दिया, तो रोमनों ने इस ग्रह को अपने सबसे बड़े देवता जूपिटर का नाम दिया। जबकि गैलीलियो ने इसके चार चन्द्रमाओ को 1610 मे ही देख लिया था, जिनके नाम ग्यानीमेड, आईओ, यूरोपा व काल्लीस्टो हैं। जबकि ग्यानीमेड चांद बुद्ध ग्रह से भी बड़ा है। आज इसके 79 चांद खोजे जा चुके हैं 53 का नामकरण किया जा चुका है।

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वहीं शनि जिसे प्रकृति ने रंगबिरंगे मनोहारी वलय का वरदान देकर सबसे खूबसूरत बनाया उसे पौराणिक ग्रन्थों व कथाओं मे अशुभ बताया गया है। पाश्चात्य ज्योतिष मे शनि को सैटर्न कहा गया जो जुपिटर के पिता है। रोमन लोग सैटर्न को कृषि का देवता मानते थे। 30 वर्षो मे सूर्य की परिक्रमा पूरी करने के कारण प्राचीन काल मे इसे शनै:चर (बहुत धीरे चलने वाला) नाम दिया गया था, जिसे बाद मे धन्धविश्वशियो ने सनीचर बना दिया। शनि के हार, वलय, कंकड़, कण, ठोस व द्रव खगोलविदों के लिए हमेशा एक अद्भुत जिज्ञासा रही है जिसे खगोलविद जिओवान्नी ने वलयों का विभाजन व बोर्बोव ने वलयों की मोटाई चौड़ाई का अनुमान बताकर शनि के अरबो लघुचन्द्रों की कल्पना का खंडन करते हुए चौड़ाई का अनुमान लगा 70 हजार किमी के लगभग बताया था। 1997 मे शनि की ओर भेजे गए कासिसिनी- हाइगेन्स यान ने 2005 मे शनि के वलयों के पास शनि के छोटे से चांद हैपरिओन के पास पहुँचकर कई तस्वीरें धरती मे भेजी। जिससे अब हम जानते है कि शनि के चारो ओर लगभग तीन प्रमुख सेकेंद्री वलय हैं। जिनका व्यास लगभग 2,70,000 किमी है मोटाई करीब 100 मीटर है जो 70 हजार किमी की ऊंचाई से शुरू होकर 140 हजार किमी तक फैले हैं, जबकि ब्रिटिश भौतिकवेत्ता जेम्स कलार्क मैक्सवेल बता चुके है कि शनि के वलयों को ठोस या द्रवरूप संयोजन गड़ित रूप से वलय नहीं बना सकते, उन्होंने वलयों कणो, ठोस व द्रवरूप के प्रत्येक कण को एक चंद्र बताया है। पर अब तक वलयों को छोड़ शनि के 82 उपग्रहों को खोजे जा चुके है, जिनमे 29 चन्द्रमाओं की पुष्टि होनी अभी बाकि है। *शनि का टाइटन उपग्रह हमारे सौर मंडल का दूसरा सबसे बड़ा चाँद है टाइटन उपग्रह की विशेषता यह है कि इसमें वायुमंडल भी है जिसमे 90 प्रतिशत नाइट्रोजन व बाकी मीथेन गैस है।

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आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के वरिष्ठ खगोल विज्ञानी ब्रह्मांड के अनेक शोधों मे अहम भूमिका निभा चुके डॉ शशिभूषण पांडेय के अनुसार 21 अगस्त को शनि चन्द्रमा के पास 3.7 डिग्री की दूरी व रविवार को ब्रह्स्पति 4 की डिग्री पर नजर आएगा जिसे नग्न आंखों से बिना झिलमिल करते हुए तारे की तरह देखा जा सकता है। वही मौसम साफ रहने पर अच्छी दूरबीन की सहायता से देखने पर शनि के वलय रिंग व रविवार को चांद के करीब बृहस्पति के उपग्रहों को भी देखा जा सकता है।

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पिछले 20 सालों से खगोलीय घटनाओं पर लेखन करते आ रहे वरिष्ठ पत्रकार रमेश चंद्रा ने बताया कि आज के दौर मे अंतरिक्ष की ओर बढ़ती जिज्ञासाओं ने खगोलीय घटनाओं के महत्व को बढ़ा दिया है, सन 1609 ई मे केपलर के ग्रहों की गतियों के नियम प्रकाशित होने के साथ ही महान खगोल वैज्ञानिक गैलीलियो गैलीलेई के महत्वपूर्ण दूरबीन का अविष्कार व आकाश के पिंडो का अवलोकन कर चांद की सतह के खड्ड, पहाड़ ओर सूर्य के काले धब्बों को देख लिया था। ब्रह्स्पति की ओर देख कर उसके उपग्रहों को पहचानते हुए बता दिया था जिस तरह चांद पृथ्वी की परिक्रमा करता है उसी तरह गुरु के चारो ओर भी उपग्रह परिक्रमा कर रहे है। आज हम खगोल विज्ञानियों के अथक मेहनत,शोधों से नित नई खोजों से ब्रह्मण्ड की नई जानकारी प्राप्त करते हुए काल्पनिकता के पर्दे मे छुपे अंतरिक्ष रहस्यों को समझ रहे हैं।


नैनीताल मे शनिवार व रविवार को मौसम साफ रहने की स्थिति मे अंतरिक्ष मे रुचि रखने वाले खगोल प्रेमियों को इन घटनाओं को अवश्य देखना चाहिए।

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