चुनावी चक्कलस : उत्तराखण्ड की एक हॉट विधानसभा सीट की

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प्रदीप लोहनी (nainilive.com ) – आज बात आगामी विधानसभा चुनाव की दृष्टि से हॉट सीट बनी उत्तराखण्ड के एक विधानसभा क्षेत्र में एक राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी की। बात इसलिए भी जरूरी हैं क्योंकि इस राष्ट्रीय पार्टी के एक बुजुर्ग नेता ने जाते जाते विरोधियों व पार्टी को ऐसी पटकनी दी हैं कि अब इस सीट से चुनाव लड़ रहे उनकी पार्टी के महारथी भी समझ नहीं पाए।

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जी हाँ, आप बिल्कुल सही पढ़ रहे हैं। बात उत्तराखण्ड की एक हॉट विधानसभा सीट की हो रही हैं जहाँ से इस राष्ट्रीय पार्टी के दो चिर-परिचित प्रतिद्वंदी इस बार भी चुनाव मैदान में उतरने के लिए टिकट की ताल ठोक रहे थे जिनमें से एक बुजुर्ग हैं तो एक कमोबेश युवा कहे जा सकते हैं। वैसे दोनों ही प्रतिद्वंदियों का पार्टी से टिकट न मिलने पर एक दूसरे के विरुद्ध निर्दलीय खड़ा होना आम बात हैं तथा दोनों ही इस प्रेम को बड़ी शिद्दत से बारी-बारी निभाते आ रहे हैं लेकिन कुल मिलाकर देखा जाय तो अभी तक बाजी बुजुर्गवार के ही पक्ष में रही।


इस बार के चुनाव में भी दोनों टिकट के लिए पूरे दम-खम से ताल ठोक रहे थे लेकिन अहोभाग्य इस बार होनी को कुछ और ही मंजूर था और इन दोनों की लड़ाई में फायदा तीसरे का हो गया और तीसरे दावेदार को टिकट मिलते ही पूर्व की भांति बुजुर्ग दावेदार व उनके सिपहसालारों ने म्यान से तलवारे बाहर खिंच ली तथा भरी सभा में अपनी पार्टी से त्यागपत्र देने व निर्दलीय ही चुनाव मैदान में उतरने की घोषणा कर दी। इस बीच इन सब से अनजान तीसरी नेता, जो महिला हैं और जिन्हें टिकट प्राप्त हुआ था, बुजुर्ग नेता से मिलकर उनकी नाराजगी दूर करने व आशीर्वाद लेने उनके द्वारे पहुंच गई जहाँ उनके लिए बुजुर्ग नेता के घर के दरवाजे बंद कर दिए गए तथा गो बैक के नारे लगने लगे। उन्हें बेइज्जत होने के साथ ही कोप का भाजन भी बनना पड़ा जिस कारण उनकी आंखों से आँसू छलकने लगे।

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शायद उस समय स्थिति इतनी तनावपूर्ण थी कि बुजुर्ग नेता के समर्थक कोई अप्रिय घटना भी कर सकते थे। इतना ही नहीं उनके कट्टर समर्थक तो भरी सभा में मंच से यहा तक कहने से भी नहीं चूके कि पार्टी ने उनके पीठ में छुरा भोका हैं तथा अब वह भी पार्टी की पीठ में छुरा भोकने में पीछे नहीं हटेंगे। अनेक लोग तो टिकट बाटने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले एक वरिष्ठ नेता जो स्वयं को अपनी पार्टी का मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करवाना चाहते थे लेकिन असफल रहे परंतु अपने राजनीतिक कौशल से चुनाव अभियान के प्रमुख बन ही गए, को जहाँ से टिकट मिला उस क्षेत्र में जाकर उनकी मिट्टी कूटने तक की बात भी करने लगे। नेताजी व उनके समर्थकों में चारो ओर आक्रोश ही आक्रोश नजर आ रहा था तथा पार्टी व चुनाव अभियान के प्रमुख को गलियाते कोई थक नहीं रहा था।


अब बारी थी दूसरे प्रतिद्वंद्वी नेताजी की और उन्हें भी अपने को जीवित दिखाना जरूरी था। उन्होंने भी अगले दिन अपने समर्थकों की एक सभा बुलाई और अपने चिर प्रतिद्वंद्वी द्वारा पार्टी से त्यागपत्र देने व निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा के बाद इस आस में कि अब वह पार्टी में निर्विवाद रूप से सबसे ज्यादा जनाधार वाले नेता हो गए हैं तथा उनके चिर प्रतिद्वंद्वी ने पार्टी छोड़ ही दी हैं, पार्टी से टिकट वितरण में पुनर्विचार कर उन्हें टिकट देने की मांग करते हुए पार्टी को टिकट पर पुनर्विचार के लिये अगले दिन तक का समय दे दिया।

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बस यही से कहानी में ट्विस्ट आ गया और ट्विस्ट इतना जबरदस्त था जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। टिकट वितरण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रमुख नेता ने अपना टिकट एक सुरक्षित लगने वाली सीट में पक्का तो करवा लिया लेकिन उस सीट से दावेदारी कर रहे अपने एक प्रमुख सिपहसालार रहे क्षत्रप को दूसरी सीट से लड़ने के लिए मनाने में नाकाम रहे तथा ऐसी स्थिति में उसी सीट से चुनाव लड़ने पर अपनी हार निश्चित देख आनन-फानन में अपने कद व बर्चस्व का प्रयोग कर ऐन मौके में मैं नहीं तो तू भी नहीं कहते हुए अपनी व अपनी सिपहसालार की सीट ही परिवर्तित करवा दी और खुद को बुजुर्ग व युवा नेता के नाराजगी वाली सीट से पूर्व में घोषित प्रत्याशी का टिकट काटकर तथा अपने पूर्व सिपहसालार को उसकी गृह सीट से टिकट करवा दिया।


अब राजनीति के माहिर बुजुर्ग नेता ने देखा कि जब मुखिया खुद ही लड़ने आ रहा हैं तो विद्रोह कर निर्दलीय लड़ने में खर्च करने से बेहतर हैं मुखिया का स्वागत किया जाय यदि जीत गया तो श्रेय मिलेगा तथा खुद को या परिवार से किसी को आगे बढ़ाने का अवसर बना रहेगा और हार भी गया तो क्या फर्क पड़ता हैं। वह तो वैसे भी अपनी पारी खेल ही चुके हैं तथा उनकी न हींग लगनी हैं न फिटकरी लेकिन रंग चोखा ही होना हैं।


युवा नेता भी अपना राजनीतिक भविष्य देखते हुए विद्रोह करने की हिम्मत नहीं कर सके तथा अब नए राजनीतिक हालातों में दोनों चिर-परिचित धुर प्रतिद्वंद्वी एक साथ एक पाले में तथा जिसका टिकट घोषित हो गया था वह अलग-थलग नजर आने लगी तथा पहले ही बुजुर्ग नेता व उनके समर्थकों द्वारा अपमानित महिला नेत्री टिकट कटने से खुद को ठगा महसूस करने लगी और क्षेत्र की मातृशक्ति व समर्थकों के मध्य रायसुमारी के बाद उन्होंने भी निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरने का फैसला कर लिया।

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अब एक पाले में बुजुर्ग नेता, उनके चिर प्रतिद्वंद्वी कमोबेश युवा नेता अपने-अपने समर्थकों व पार्टी के अन्य नेताओं के साथ तो दूसरे पाले में महिला नेत्री अपने समर्थकों के साथ ताल ठोक रहे हैं। अब इस रण में भले ही कोई भी जीते या हारे बुजुर्ग नेता के दोनों हाथों में लड्डू हैं क्योंकि जीतने में जहाँ श्रेय लेंगे वही हारने पर भी उनके सारे प्रतिद्वंद्वी ठिकाने तो लग ही गए हैं लेकिन युवा नेता की दिक्कत किसी भी सूरत में कम होती नजर नहीं आ रही। क्योंकि यदि मुखिया जीत गए तो इस सीट पर आगे उन्हीं का या उनके परिवार से किसी का कब्जा हो जाएगा और यदि हार गए तो महिला नेत्री जो टिकट कटने के बाद अब निर्दलीय मैदान में हैं, उसके रूप में उन्होंने भविष्य के लिए एक मजबूत प्रतिद्वंद्वी तो बना ही लिया हैं। रही बात मुखिया की तो उन्हें हार-जीत से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उन्हें भी हारते रहने का अच्छा अनुभव हैं, वैसे भी उनकी अब उम्र भी हो चली हैं।

लेखक प्रदीप लोहनी अधिवक्ता , राजनैतिक विश्लेषक एवं स्तम्भकार हैं. आलेख में प्रस्तुत विचार उनके स्वयं के विचार हैं।

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